राज्‍य के नीति निर्देशक सिद्धांत - Study Hindi


भूमिका (INTRODUCTION)
राज्य के निति निर्देशक सिधांत जो संविधान निर्माताओ की महत्वाकांक्षाओ को प्रतिबिंबित करते हिया ,संविधान के भाग -4 में दिए गए हिया |
इसके अतिरिक्त संविधान के कुछ अन्य अनुच्छेद जैसे – 335 ,350 A तथा 351 भी इन्ही से सम्बंधित है |नीति निर्देशक सिधान्तो का मुख्य उद्देश्य लोकतंत्रको वास्तविक बनाने के लिए सामाजिक व् आर्थिक आधार प्रदान करना है |इन सिधान्तो को अदालतों के माध्यम से लागु नहीं कराया जा सकता | यह केवल राज्य को निदेश के रूप में है तथा नीति निर्धारित करते समय सरकार को इन्हें ध्यान में रखना पड़ता है |
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मुख्य नीति निर्देशक सिद्धान्त (Important Directive Principles) नोति निर्देशक सिद्धान्तों को मुख्यतया निम्न तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

1.   आर्थिक एवं समाजवादी सिद्धान्त (Economic and Socialist Principles)-

इन सिद्धान्तों का मुख्य उद्देश्य सामाजिक तथा आर्थिक न्याय प्रदान करना व देश में एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। अनुच्छेद 39 के अंतर्गत यह सिद्धान्त राज्य को आदेश देते हैं कि :
 (a) सभी नागरिकों को जीविका के उपयुक्त साधन प्रदान करना।
         (b)धन तथा उत्पादन के साधनों के केन्द्रीकरण को रोकना तथा धन व भौतिक                      साधनों का न्याय संगत बंटवारा करना (अनुच्छेद 40)
         (c) पुरुषों व स्त्रियों दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन दिलाना।
        (d) सभी कर्मकारों को शिष्ट जीवनस्तर तथा अवकाश प्रदान करना। शिशुओं व युवाओं      के शोषण को रोकने तथा उन्हें आवश्यक  अवसर व सुविधाएं प्रदान कराना।
        (e) काम व शिक्षा दिलाने का प्रयास करे तथा बेकारी, बीमारी, बुढ़ापे में लोक सहायता प्रदान करे (अनुच्छेद 40)

2.   गांधीवादी सिद्धान्त (Gandhian Principles)-

यह सिद्धान्त गांधीवादी पुनर्निमाण कार्यक्रम के प्रतीक हैं। इसमें शामिल सिद्धान्त हैं:
(a) ग्रामीण पंचायतों के संगठन के लिए कदम उठाना तथा उन्हें स्वायत शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाना (अनुच्छेद 40)
(b) समाज के पिछड़े वर्गों के शैक्षिक तथा आर्थिक हितों को बढावा देना (अनुच्छेद 39-क)।
       (c)कुटीर उद्योगों के विकास को प्रोत्साहन देना।
       (d) नशीली दवाइयों व शराब इत्यादि के सेवन पर प्रतिबन्ध लगाना।
       (e) गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू जीवों के वध को रोकना।

3. उदारवादी सिद्धान्त (Liberal Principles)-

सिद्धान्त उदारवादी विचारधारा पर आधारित हैं तथा निम्न सिद्धान्तों पर बल देते हैं:
(a)भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान
दीवानी संहिता (अनुच्छेद-49)
(b) 14 वर्ष की आयु तक सभी बच्चों के लिए अनिवार्य तथा निशल्क शिक्षा (अनुच्छेद-45)
(c) न्यायपालिका तथा कार्यपालिका का पृथक्करण (अनुच्छेद-50)
(d) आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को निशुल्क कानूनी सहायता प्रदान करना ताकि कोई भी नागरिक आर्थिक तथा अन्य अभावों के कारण न्याय पाने से वंचित न रह जाए (अनुच्छेद-39A)
(e)कृषि तथा पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से संगठित करने का प्रयास।
(f) उद्योगों के प्रबन्ध में कर्मकारों को भाग देना (अनुच्छेद-43ASI
(g) पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन व वन्य जीवों की रक्षा।
(h) राष्ट्रीय महत्त्व के संस्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण।

विदेशो क्षेत्र में यह सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा, राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखना, अंतर्राष्ट्रीय कानून तथा संधिबाध्यताओं का पालन तथा अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाना इत्यादि (अनुच्छेद-51)

अतिरिक्त नीति निर्देशक सिद्धान्त (Additional Directive Principles)

मूल संविधान में दिए गए नीति निर्देशक सिद्धान्तों में अनेक नए सिद्धांत जोडे गए। 1976 में संविधान में किए गए 42वें संशोधन द्वारा चार नए सिद्धान्त जोड़े गए जो इस प्रकार हैं:
(a)राज्य शिशुओं के स्वस्थ विकास के अवसर प्रदान करेगा (अनु. 39)
(b)राज्य समान न्याय प्रदान कराने के उद्देश्य से निर्धन व्यक्तियों को निःशुल्क कानूनी सहायता प्रदान करेगा (अनु. 39A)
(c)राज्य उद्योगों के प्रबन्धन में कामगरों को भागीदारी प्रदान करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगा। (अनु. 43A)|
(d) राज्य वातावरण के संरक्षण व सुधार के लिए प्रयास करेगा तथा वन व वन्य जीवन को संरक्षण देगा (अनु. 48ATI
1978 में किए गए 44वें संवैधानिक संशोधन द्वारा एक और जोति निदेशक सिद्धान्त जोड़ दिया गया जो राज्य से अपेक्षा करता है कि आय. समाजमस्थान मविधाआ तथा अवसरों की असमानता को कम करन का प्रयास करेगा (अन. 381
2002 में एक बार फिर नीति निर्देशक सिद्धान्तों में 86वां संशोधन कर राज्य से अपेक्षा की गई कि 6 से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों का प्राराम्भक देख-भाल व शिक्षा का प्रबन्ध करा
                                                       

व्यवहार में नीति निर्देशक सिद्धान्त (Directive Principles in Practice)

भले ही नीति निर्देशक सिद्धान्तों को कोर्ट के माध्यम से लागू नहीं कराया जा सकता, परंतु सरकार ने कानून बनाते समय इन सिद्धान्तों को परा सम्मान दिया है। केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों ने अपने सीमित साधनों के होते हुए भी विभिन्न नीति निर्देशक सिद्धान्तों को कार्यान्वित किया है। अत: उन्होंने बहुत सी पुरानी व बेकार संस्थाओं जैसे कि ज़मींदारी तथा जागीरदारी को समाप्त कर दिया है तथा काश्तकारों को भूमि का मालिक बना दिया है। काश्तकारों की स्थिति को सुधारने के लिए अनेक कानून पास किए गए हैं। अस्पृयता की कुरीति को समाप्त कर दिया गया है तथा इसके पालन को एक दणडनीय अपराध घोषित कर दिया गया है। कर्मकारों तथा श्रमिकों के न्यूनतम वेतन निर्धारित कर दिए गए हैं। उनकी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए अनेक कानून बनाए गए हैं। समस्त देश में पंचायतों की स्थापना कर दी गई है तथा उन्हें विभिन्न क्षेत्रों में वास्तविक शक्तियां प्रदान की गई हैं। कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अनेक मंडल गठित किए गए हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार प्रमुख हैं-अखिल भारतीय खादी तथा ग्रामोद्योग बोर्ड, लघु उद्योग बोर्ड, रेशम बोर्ड, अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड, अखिल भारतीय हथकरघा बोर्ड इत्यादि। बहुत से राज्यों में गायों, बछड़ों इत्यादि के वध को वर्जित घोषित कर दिया गया है। अत: हम कह सकते है कि नीति निर्देशक सिद्धान्तों को कार्यान्वित करने के लिए अनेक प्रयास किए गए हैं। परंतु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अभी भी बहत कुछ करना शेष है।
प्रशासन के अतिरिक्त न्यायपालिका ने भी नीति निर्देशक सिद्धान्तों को लाग करने में बहुत योगदान दिया है तथा संविधान की व्याख्या करते समय इन्हें ध्यान में रखा है। यह सत्य है कि नीति निर्देशक सिद्धान्तों को न्यायालय के माध्यम से लागू नहीं कराया जा सकता, परन्तु फिर भी वह देश के प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण है। कोई भी सरकार उनकी अवहेलना नहीं कर सकती। यदि वह ऐसा करती है तो वह जनसाधारण का विश्वास खो सकती हैं।

नीति निर्देशक सिद्धान्तों तथा मौलिक अधिकारों में सम्बन्ध (Relation between Directive Principles and Fundamental Rights)

 संविधान ने नीति निर्देशक सिद्धान्तों को मौलिक अधिकारों की तुलना में निम्न स्थान प्रदान किया है क्योंकि उन्हें न्यायपालिका द्वारा लागू नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त नीति निर्देशक सिद्धान्त मौलिक अधिकारों के अनुरूप होने चाहिए। यदि दोनों में टकराव होता है तो मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता दी जाती है। भले ही
नीति निर्देशक सिद्धान्त मौलिक अधिकारों से निम्न माने जाते हैं परन्तु न्यायालयों ने । उनकी अवहेलना नहीं की और उन्हें मौलिक अधिकारों की भांति लागू करने तथा
दोनों के बीच मधुर सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया है। न्यायालय का मत है कि नीति निर्देशक सिद्धान्त तथा मौलिक अधिकार दोनों का उद्देश्य सामाजिक क्रांति लाना तथा कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। सरकार ने 1971 में 25वें संवैधानिक संशोधन द्वारा नीति निर्देशक सिद्धान्तों को बढ़ाने का प्रयास किया तथा यह प्रयोजन किया कि यदि अनुच्छेद 39(ब) व 39(स) के अंतर्गत नीति निर्देशकों को लागू करने के लिए कोई कानून पास किया जाता है तो वह कानून इस ना आधार पर अवैध घोषित नहीं किया जाएगा कि वह मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित अनुच्छेद 14 19 से मेल नहीं खाता अथवा मौलिक अधिकारों को सीमित करता है।
संविधान के 42वें संशोधन ने सभी नीति निर्देशक सिद्धान्तों को अनुच्छेद 14.19 तथा 31 में दिए गए मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता प्रदान करने का प्रयास किया। ऐसा करने का मुख्य उद्देश्य नीति निर्देशक सिद्धान्तों की मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता पुनस्थापित करना था। परन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने इन प्रावधानों को इस आधार पर रद्द कर दिया कि यह संविधान के मूल ढांचे को नष्ट करते हैं (मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ) इस मामले में बहुमत का विचार था कि संविधान भागा तथा भाग IV के संतुलन पर टिका है। यदि दोनों में से किसी एक को सम्पूर्ण प्राथमिकता दी जाती है तो इससे संविधान की समरसता (harmony) जो कि संविधान का एक अनिवार्य अथवा मूल तत्व है, बिगड़ जाएगी।न्यायालय का मत था कि नीति निर्देशक सिद्धान्तों तथा मौलिक अधिकारों में कोई टकराव नहीं, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं तथा उन्हें एक-दूसरे के लिए बलिदान नहीं किया जाना चाहिए। इसी प्रकार एक बार फिर सर्वोच न्यायालय ने 1984 में तामिलनाडु राज्य बनाम एल० अबु कावुर बाई (State of Tamil Nadu Vs. L. Abu Kavur Bai) के मामले में मत व्यक्त किया कि भले ही नीति निर्देशक सिद्धान्तों कोन्यायालय द्वारा लागू नहीं किया जा सकता, परन्तु फिर भी अदालतों को प्रयास करना चाहिए कि दोनों के बीच ताल-मेल बनाए रखें। जहां तक सम्भव हो नीति निर्देशक सिद्धान्तों तथा मौलिक अधिकारों में टकराव न होने दिया जाए। अदालत ने मत व्यक्त किया कि संविधान निर्माताओं ने इन सिद्धान्तों का इसलिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं बनाया क्योंकि वह सरकार को इन सिद्धान्तों को लागू करने के मामले में पर्याप्त स्वतंत्रता देना चाहते थे वह चाहते थे कि सरकार इन्हें समय, समता तथा उपलब्ध परिस्थितियों के अनुरूप कार्यान्वित करें।

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