भारतीय संविधान के मुख्य लक्षण (Features of the Indian Constitution)


भारतीय संविधान के मुख्य लक्षण (Features of the Indian Constitution)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद ,भारतीय संविधान के लक्षण

1.   विश्व का एक विस्तृत संविधान (One of Bulkiest Constitution of the World)

भारत का संविधान संसार के सबसे विस्तृत संविधानों में से एक है। जब संविधान बनकर तैयार हुआ तो इसमें 395 अनुच्छेद तथा आठ अनुसूचियां थी परन्तु अब इसमें 444 अनुच्छेद हैं। इन अनुच्छेदों को 26 भागों में बांटा जा सकता है तथा इसमें 12 अनुसूचियां हैं। भारत के संविधान के इतना अधिक विस्तृत होने के अनेक कारण हैं।
1. भविष्य में किसी प्रकार की कमियों को रोकने के उद्देश्य से  अनेक संविधानों के अच्छे प्रावधानों को संविधान में सम्मिलित किया गया।
2.अन्य संघीय देशों की भांति भारत में राज्यों के अलग संविधान नहीं हैं। भारत के संविधान में केन्द्र तथा राज्यों की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है जिससे इसका आकार बढ़ गया है।
3.संविधान में मौलिक अधिकारों, मौलिक कर्तव्यों तथा नीति निर्देशक सिद्धान्तों का उल्लेख किया जाता।
4. देश के सम्मुख उपस्थित अनूठी समस्याओं के फलस्वरूप अनुसूचित जातियों, जन जातियों, पिछड़ी जातियों, सरकारी भाषा  सम्बन्धी प्रावधानों का जोड़ा जाना।
5. देश तथा जनता के हितों की रक्षा हेतु संविधान में विशेष आपातकाल
प्रावधान जोड़े गए।
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6.न्यायपालिका के संगठन, लोक सेवाओं, चुनाव इत्यादि से सम्बन्धित प्रावधानों के जोड़े जाने से भी संविधान के आकार में वृद्धि हुई।
7.राज्यों तथा केन्द्र के मध्य होने वाले मतभेदों को रोकने के उद्देश्यसे केन्द्र व राज्यों के सम्बन्धों का विस्तृत उल्लेख किया गया।
8. अनेक व्यावहारिक बातें जिनका उल्लेख संविधान में प्राय: नहीं  किया जाता, भारत के संविधान में शामिल की गई हैं।
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2. कठोरता तथा लचीलेपन का मिश्रण (Combination of Rigiditvand Flexibility)

भारत का संविधान कठोरता तथा लचीलेपन के मिश्रण का एक अनोखा उदाहरण है। भारत के संविधान के बहुत से ऐसे प्रावधान हैं। जिन्हें संसद अकेले साधारण बहुमत से बदल सकती है जबकि अन्य प्रावधानों को बदलने के लिए न केवल संसद का दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए बल्कि उसे आधे से अधिक राज्यों का भी समर्थन प्राप्त होना चाहिए। कुछ एक प्रावधानों को संसद अकेली बदल सकती है परन्तु इसके लिए इसे दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त एक नए प्रावधान के अंतर्गत संसद को अधिकार भारत का संवैधानिक विकास



3.संसदीय शासन व्यवस्था (Parliamentary System of Goyernment)

भारत का संविधान देश में संसदीय व्यवस्था का प्रयोजन करता है जिसमें राष्ट्रपति एक नाममात्र का अध्यक्ष है तथा वास्तविक कार्यकारिणी शक्तियों का प्रयोग मन्त्री परिषद द्वारा किया जाता है। यह मन्त्री परिषद् तब तक अपने पद पर बनी रह सकती है जब तक इसे संसद का समर्थन प्राप्त रहता है। संविधान निर्माताओं द्वारा संसदीय शासन व्यवस्था अपनाए जाने के अनेक कारण थे। प्रथम, देश में संसदीय व्यवस्था पहले से विद्यमान थी तथा भारत के लोग इसकी कार्य विधि से भली-भांति परिचित थे। दसरा देश के बड़े आकार तथा सांस्कतिक विभिन्नता के कारण भी संसदीय सरकार को उचित समझा गया। तीसरा, विधान सभा के सदस्य कार्यकरिणी तथा विधायिका के मध्य होने वाले विवादों से बचना चाहते थे अत: उन्होंने संसदीय सरकार अपनाना अधिक उचित समझा।

4. एक सशक्त केन्द्र वाली संघीय व्यवस्था (Federal System with a strong Centre)

भारतीय संविधान ने एक ऐसी संघीय व्यवस्था का प्रावधान किया है जिसमें केन्द्र बहुत शक्तिशाली है। परन्तु संविधान में कहीं भी संघीय शब्द का प्रयोग नहीं किया गया। इसके विपरीत भारत का संविधान भारत को राज्यों का संघ घोषित करता है। जिसका अभिप्राय यह है कि यह संघ इकाइयों के बीच हुए समझौते का परिणाम नहीं है तथा राज्य इससे अलग नहीं हो सकते। वास्तव में भारत में संघीय व्यवस्था के बहुत से लक्षण विद्यमान हैं परन्तु इसके साथ साथ यहां पर एकात्मक शासन व्यवस्था के भी बहुत से लक्षण विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त आपातकालीन परिस्थितियों में संघीय व्यवस्था एकात्मक रूप धारण कर लेती है तथा केन्द्र व राज्यों के बीच साधारण सम्बन्धों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आ जाते हैं।


5. मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)-

भारत का संविधान नागरिकों को विस्तृत मौलिक अधिकार प्रदान करता है। राज्य कोई भी ऐसा कानून नहीं बना सकता जिससे नागरिकों के अधिकार सीमित हों। यदि राज्य ऐसे कानून का निर्माण करता है तो न्यायपालिका उसे असंवैधानिक घोषित कर सकती है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि भारतीय नागरिकों को प्रदान किए गए मौलिक अधिकार अबाध नहीं हैं तथा उन पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैं। दूसरे शब्दों में संविधान व्यक्ति की स्वतन्त्रता तथा सामाजिक हितों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

6. मौलिक कर्त्तव्य (Fundamental Duties)

संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्त्तव्यों का भी उल्लेख है। यह कर्त्तव्य संविधान में 42वें संशोधन 1976 में जोड़े गए। इस समय इनकी संख्या 10 थी परन्तु, 86वें संविधानिक संशोधन द्वारा एक अतिरिक्त मौलिक कर्तव्य इस सूची में जोड़ दिया गया। इस प्रकार इन कर्त्तव्यों की संख्या 11 हो गई। इन कर्त्तव्यों का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को याद दिलाना है कि उन्हें लोकतान्त्रिक व्यवहार के कुछ नियमों व मान्यताओं का पालन करना है।

7. राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्त (Directive Principles of State Policy)

संविधान ने कुछ राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों का उल्लेख किया है जिनका पालन सरकार को नीति निर्धारित करते समय करना है। सिद्धान्तों का उद्देश्य कल्याणकारी राज्य स्थापित करना व लोकतन्त्र को सामाजिक एवं आर्थिक आधार प्रदान करना है। मौलिक अधिकारों के विपरीत नीति निर्देशक सिद्धान्तों को न्यायिक संरक्षण प्राप्त नहीं है। इसका अभिप्राय यह है कि यदि राज्य इन सिद्धान्तों का पालन करने में विफल रहता है तो इसके विरुद्ध न्यायालय में


8. धर्म निरपेक्ष राज्य (Secular State)

संविधान भारत को एक धर्म निरपेक्ष राज्य घोषित करता है। इसका अभिप्राय यह है कि भारत में कोई भी राज्यधर्म नहीं है और राज्य धार्मिक मामलों में निष्पक्ष है। भारत के नागरिकों को किसी भी धर्म में विश्वास रखने, उसका पालन करने तथा उसका प्रचार करने का  अधिकार है। यह ज्ञात रहे कि संविधान नागरिकों को असीमित धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान नहीं करता तथा जनहित में इस स्वतन्त्रता को नियन्त्रित किया जा सकता है।

9.न्यायपालिका की स्वतन्त्रता (Independence of Judiciary)

संविधान एक स्वतन्त्र न्यायपालिका की स्थापना करता है जो यह निश्चित करती है कि देश का शासन संविधान के प्रावधानों के अनुसार चलाया जा रहा है। न्यायपालिका नागरिकों की स्वतन्त्रता और मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में कार्य करती है। यह राज्य सरकारों एवं केन्द्र सरकार के अधिकार क्षेत्र की सीमाएं भी निश्चित करती है।

10. जनता शक्ति का स्त्रोत (People as Source of Authority)

संविधान जनता के नाम में घोषित किया गया है तथा इसे समस्त शक्ति भी जनता से प्राप्त होती है। यह बात संविधान की प्रस्तावना से ही स्पष्ट हो जाती है। प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से कहा गया है "हम, भारत के लोग....इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

11. सार्वजनिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise)

संविधान बिना भेदभाव के सभी वयस्क नागरिकों को जिनकी आयु, 18 वर्ष से ऊपर है बिना भेदभाव के मतदान का अधिकार प्रदान करता है। परन्तु अनुसूचित जातियोंजन जातियों को उपयुक्त प्रतिनिधित्व देने के उद्देश्य से कुछ स्थान सुरक्षित कर दिए गए हैं।




12. आपातकालीन शक्तियां (Emergency Powers)

संविधान आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए राष्ट्रपति को विस्तृत अधिकार प्रदान करता है । संविधान में तीन प्रकार की आपात परिस्थितियों की कल्पना की गई है। प्रथम बाहा आक्रमण अथवा आन्तरिक विद्रोह के कारण उत्पन्न होने वाला संकट। दूसरा राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल होने के कारण उत्पन्न होने वाला संकट तथा तीसरा, देश की अर्थव्यवस्था बिगड़ जाने अथवा उसकी साख को खतरा उत्पन्न होने के कारण उत्पन्न होने वाला संकट। आपातकालीन परिस्थितियों में केन्द्र को इतने अधिक अधिकार मिल जाते हैं कि वास्तव में संघीय व्यवस्था एकात्मक शासन व्यवस्था का रूप धारण कर लेती है।

13.इकहरी नागरिकता (Single Citizenship)

भारत का संविधान सभी नागरिकों को एक समान नागरिकता प्रदान करता है। यह नागरिक देश के किसी भी भाग में रहते हों परन्तु भारत के नागरिक माने जाते हैं तथा उन्हें समान  अधिकार प्राप्त हैं। भारत में अलग राज्यों में रहने वाले व्यक्तियों के लिए अलग नागरिकता नहीं है।

14. द्वि-सदनीय विधायिका (Bicameral Legislature)

केन्द्र में दो सदनीय संसद की व्यवस्था की गई है। इन दो सदनों के नाम लोक सभा तथा राज्य सभा हैं। लोक सभा जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों का सदन है जब कि राज्य सभा में राज्यों के प्रतिनिधि होते हैं।

15. अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रावधान (Special Provisians for Minorities)

संविधान ने अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों, जन जातियों इत्यादि के लिए विशेष प्रावधान किया है। इन वर्गों के लिए न केवल संसदव राज्य विधान सभाओं में स्थान सुरक्षित किए गए हैं, अपितु उन्हें विशेष अधिकार तथा सुविधाएं भी प्रदान की गई हैं।



16.पंचायती राज (Panchayati Raj)-

देश में न केवल पंचायती. राज की स्थापना की गई है, उसे संवैधानिक स्वरूप भी प्रदान किया गया है। पंचायती राज को यह संवैधानिक स्वरूप 1992 में 73वें संशोधन द्वारा दिया गया। उसी वर्ष 74व संशोधन द्वारा शहरी क्षेत्रों में स्थानीय संस्थाओं को भी संवैधानिक स्वरूप प्रदान किया गया।

17. विधि का शासन (Rule of Law)-

विधि का शासन भारतीय संविधान की एक अन्य विशेषता है। यह धारणा ब्रिटेन से ग्रहण की गई। इसका अभिप्राय यह है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं तथा सभी व्यक्ति साधारण न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। विधि के शासन के मुख्यत: तीन लक्षण हैं: प्रथम किसी भी व्यक्ति को तभी दंडित किया जा सकता है, जब वह किसी लागु कानून का उल्लंघन करता है, दूसरा सभी व्यक्ति कानून के सम्मुख समान हैं तथा तीसरा कोई भी व्यक्ति उससे ऊपर नहीं है।



18. संविधानिक सर्वोच्चता तथा संसदीय प्रभुसत्ता में संतुलन स्थापित करने का प्रयास (Strikes Balance between Constitutional Supremacy and Parliamentary Soverignity)-

भारत का संविधान दो परस्पर विरोधी सिद्धान्तों-संविधान की सर्वोच्चता (जो अमेरिका में विद्यमान है) तथा संसद की प्रभुत्ता (जो ब्रिटेन में विद्यमान है) में समन्वय स्थापित करने का प्रयास करता है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पास आर्थिक पुनर्वलोकन के सिद्धान्त के अन्तर्गत संसद द्वारा पारित किसी भी कानून को असंविधानिक घोषित करने का अधिकार है। इसके साथ संसद को भी संविधान के किसी भाग में संशोधन करने का अधिकार है।

19. एकीकृत न्यायपालिका (A Single Integrated Judiciary): 

संविधान एक एकीकृत न्यायपालिका का प्रावधान करता है, जिसमें शिखर पर सर्वोच्च न्यायालय है। सर्वोच्च न्यायालय के अधीन राज्य स्तर पर उच्च न्यायालयों की व्यवस्था की गई है। उच्च न्यायालय के अधीन अन्य निम्न न्यायालय है। देश में स्थापित एकीकृत न्यायालय केन्द्र व राज्यों दोनों के कानूनों को लाग करता है। यह व्यवस्था अमरीका की न्यायिक व्यवस्था से पूर्णतया भिन्न है। अमरीका में संघीय कानूनों को संघीय न्यायालय लाग करता है तथा राज्यों के कानूनों को लागू करने का उत्तरदायित्व राज्यों की अदालतों पर है।


20. कुछ स्वतन्त्र संस्थाओं की व्यवस्था (Provisoion of Independent Bodies)

संविधान सरकार के तीन परम्परागत अंगों-विधान सभा, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के अतिरिक्त कुछ अन्य संस्थाओं की व्यवस्था भी करता है। यह संस्थाएं लोकतन्त्र के संरक्षक के रूप में कार्य करती हैं। इन संस्थाओं में से कुछ निम्नलिखित हैं
1. निर्वाचन आयोग जोकि संसद राज्य विधान सभाओं तथा  राष्ट्रपति उप राष्ट्रपति के पद के लिए स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए उत्तरदायी है।
2. भारत का नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India) जोकि केन्द्र व राज्य सरकारों के लेखों का परीक्षण करता है तथा केन्द्र व राज्य सरकारों के धन के संरक्षक के रूप में कार्य करता है।
3. केन्द्र व राज्यों के स्तर पर लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था की गई है। ये आयोग केन्द्र व राज्य स्तर पर सरकारी कर्मचारियों की भर्ती के लिए आवश्यक परीक्षाओं का आयोजन करते हैं। इसके अतिरिक्त वह राष्ट्रपति व राज्यपालों को कर्मचारियों के अनुशासन से सम्बन्धित मामलों में भी परामर्श देते हैं।
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