सिन्धु घाटी सभ्यता - Study Hindi



  By Mc Graw Hill Education -शीलवंत सिंह | मीनाक्षी कांत

सिन्धु घाटी सभ्यता का उदभव

  • लगभग 5000 वर्ष पूर्व सिंधु घाटी या हड़प्पा सभ्यता का उद्भव ताम्र पाषाणिक पृष्ठभूमि पर भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर भाग में हुआ।
  • सिंधु घाटी सभ्यता के संबंध में प्रारंभिक जानकारी 1826 ई. में चार्ल्स मेसन ने दी थी।
  • वर्ष 1921 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देशन में राय बहादुर दया राम साहनी ने वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मॉण्टगोमरी जिले में रावी नदी के बाएँ तट पर स्थित हड़प्पा नामक स्थल का अन्वेषण करके सर्वप्रथम सिंधु सभ्यता के साक्ष्य उपलब्ध कराए।
  • सिंधु सभ्यता के संबंध में सर्वप्रथम हड़प्पा नामक स्थल से साक्ष्य प्राप्त होने के कारण इसे 'हड़प्पा सभ्यता' के नाम से भी जाना जाता है।
  • बीसवीं सदी के आरंभ तक इतिहासकारों एवं पुरातत्ववेत्ताओं में यह धारणा थी कि वैदिक सभ्यता ही भारत की प्राचीनतम सभ्यता है, किन्तु 1921 और 1922 में क्रमशः हड़प्पा और मोहनजोदडो नामक स्थलों की खुदाई से यह स्पष्ट हो गया कि वैदिक सभ्यता से पूर्व भी भारत में एक अन्य विकसित सभ्यता अस्तित्व में थी।
  • मार्टीमर व्हीलर, डी. डी. कौशाम्बी, गार्डन चाइल्ड सहित कई अन्य विद्वानों ने सिंधु सभ्यता की उत्पत्ति मेसोपोटामिया की सुमेरियन सभ्यता से मानी है।
  • रोमिला थापर तथा फेयर सर्विस जैसे विद्वान सिंधु सभ्यता की उत्पत्ति ईरानी- बलूची ग्रामीण संस्कृति से मानते हैं. जबकि अमलानंद घोष जैसे विद्वान सिंधु घाटी सभ्यता की उत्पत्ति सोथी संस्कृति (भारतीय) से मानते हैं।


काल निर्धारण

  • वर्ष 1931 में सर्वप्रथम जॉन मार्शल ने सिंधु घाटी सभ्यता की तिथि लगभग 3250 ई. पू. से 2750 ई. पू. निर्धारित की।
  • रेडियो कार्बन विधि जैसी वैज्ञानिक पद्धति द्वारा सिंधु घाटी सभ्यता की तिथि 2500 ई. पू. मानी जाती है। कार्बन तिथि निर्धारण पद्धति की खोज वी.एफ. लिवि द्वारा की गयी।
  • नवीनतम आँकड़ों के विश्लेषण के आधार पर यह माना गया है कि सिंधु सभ्यता का अस्तित्व लगभग 400-500 वर्षों तक बना रहा तथा 2200 ई. पू. से 2000 ई. पू. के मध्य का काल इस सभ्यता का परिपक्व चरण था।
  • अर्नेस्ट मैके सिंधु सभ्यता का काल 2800 ई. पू. से 2500 ई. पू. के मध्य निर्धारित करते हैं, जबकि माधोस्वरूप वत्स 3500 ई. पू. से 2700 ई. पू. के मध्य मानते हैं।


सिन्धु घाटी सभ्यता का विस्तार .

  • सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार उत्तर में जम्मू से लेकर दक्षिण में नर्मदा के मुहाने भगतराव तक और पश्चिम में मकरान तट से लेकर पूर्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आलमगीरपुर (मेरठ) तक है।
  • इस सभ्यता के संपूर्ण क्षेत्र का आकार त्रिभुजाकार है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 13 लाख वर्ग किमी है|
  • इस सभ्यता के स्थल पाकिस्तान और भारत दोनों देशों में पाए गए हैं।
  • पाकिस्तान में स्थित स्थलों में मोहनजोदडो, हडप्पा, चन्हूदड़ो, बालाकोट, कोटदीजी, आमरी एवं इस्माइल खाँ आदि शामिल हैं।
  • रोपड़, बनवाली, पाँडा, आलमगीरपुर, लोथल, रंगपुर, धौलावीरा और राखीगढ़ी भारत में पाये गए प्रा स्थल है। हहणा तथा मोहनजोदड़ो को अर्ट पिगट ने सभ्यता की जड़वाँ राजधानी कहा था।

निर्माता 

  • सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माताओं एवं संस्थापकों के संबंध में हमारी उपलब्ध जानकारी केवल समकालीन खंडहरों से प्राप्त मानव कंकाल एवं कपाल अर्थात् खोपड़ियाँ हैं।
  • प्राप्त साक्ष्यों से पता चलता है कि मोहनजोदड़ो की जनसंख्या में चार प्रजातियाँ शामिल थीं- 1. प्रोटो आस्ट्रेलॉयड, 2. भूमध्य सागरीय, 3. अल्पाइन तथा; 4. मंगोलॉयड।
  •  सिंधु सभ्यता के संस्थापकों को द्रविड़, सुमेरियन, दास और आर्य प्रजातियों से संबंधित बताया जाता है। परंतु अधिकांश विद्वान इस मत से सहमत हैं कि द्रविड़ ही सैन्धव सभ्यता के निर्माता थे।

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नगर नियोजन .

  • सिंधु सभ्यता अन्यथा हड़प्पा सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी नगर योजना है।
  • सैंधव लोगों ने अपने नगरों के निर्माण में शतरंज पद्धति को अपनाया। इस पद्धति में सड़कें सीधी एवं नगर सामान्य रूप से चौकोर होते थे।
  • सड़के एवं गलियाँ एक निर्धारित योजना के अनुसार बनायी गयी थीं। सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती हुई जाल-सी प्रतीत होती थीं।
  • आमतौर पर नगरों में प्रवेश पूर्वी सड़क से होता था और जहाँ यह सड़क प्रथम सड़क से मिलती थी उसे ऑक्सफोर्ड सर्कल कहा गया है।
  • जल निकासी प्रणाली सिंधु सभ्यता की अद्वितीय विशेषता थी, जो अन्य किसी भी समकालीन सभ्यता में प्राप्त नहीं होती।
  • सड़कों के किनारे बनी नालियाँ ऊपर से ढंकी होती थीं। घरों का गंदा पानी इन्हीं नालियों से होता हुआ नगर की मुख्य नाली में गिरता था।
  • नालियों के निर्माण में मख्यतः ईंटों और मोर्टार का प्रयोग किया जाता था, पर कहीं-कहीं चूने और जिप्सम का प्रयोग भी मिलता है।
  • भवनों के निर्माण में मख्यतः पक्की ईंटों का प्रयोग मिलता है, लेकिन कुछ नगरों (कालीबंगा और गपर) में कच्ची ईटों का भी प्रयोग किया गया है।
  • सभी प्रकार की ई निश्चित अनुपात में बनाई गई थीं और अधिकांशतः आयताकार थीं। इनकी लंबाई.. चौड़ाई और मोटाई का अनुपात 4:2:1 था।
  • सिंधु सभ्यता के प्रायः सभी नगर दो भागों में विभाजित थे-पहला भाग, प्राचीर युक्त दुर्ग कहलाता था; और दूसरा भाग, जिसमें जन-सामान्य निवास करते थे, निचला नगर कहलाता था।
  • घरों का निर्माण सादगीपूर्ण ढंग से किया गया था। उनमें एकरूपता थी। सामान्यतया मकान छोटे होते थे, जिनमें 4-5 कमरे होते थे।
  • प्रत्येक मकान में एक आँगन, एक रसोईघर तथा एक स्नानागर होता था। अधिकांश घरों में कुओं के अवशेष मिले है।
  • कुछ सार्वजनिक स्थल भी मिले हैं; जैसे-स्नानगृह और अन्नागार आदि। मोहनजोदड़ो का सबसे प्रसिद्ध सार्वजनिक स्थल वहाँ का विशाल स्नानागार है।
  • कुछ बड़े आकार के भवन भी मिले हैं, जिनमें 30 कमरे बने होते थे। दो मंजिलें भवनों का निर्माण भी कहीं-कहीं मिलता है।
  • स्वच्छता और सफाई का ध्यान रखते हुए घरों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर न खुलकर पीछे की ओर खुलते थे।
  • धौलावीरा एक ऐसा नगर है, जिसमें नगर तीन भागों में विभाजित था।
  • मोहनजोदडो में विशाल अन्नागार मिला है, जो 45.71 मीटर लंबा तथा 15.23 मीटर चौड़ा है। संभवतः यह सार्वजनिक स्थल था।
  • हड़प्पा में भी इस तरह के अन्नागार मिले हैं पर वे आकार में छोटे हैं। इनकी लंबाई 15.23 मीटर है तथा चौड़ाई 6.9 मीटर है।

सिन्धु सभ्यता की राजनीतिक व्यवस्था

  • सिंधु सभ्यता की राजनीतिक व्यवस्था के संदर्भ में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती है। चूंकि हडप्पावासी वाणिज्य-व्यापार की ओर अधिक आकर्षित थे इसलिए ऐसा माना जाता है कि संभवतः हड़प्पा का शासन व्यापारी वर्ग के हाथ में था।
  • व्हीलर ने सिंध प्रदेश के लोगों के शासन को मध्यमवर्गीय जनतंत्रात्मक शासन कहा है और उसमें धर्म की भूमिका को प्रमुखता दी है।
  • हंटर के अनुसार मोहनजोदड़ो का शासन राजतंत्रात्मक न होकर जनतंत्रात्मक था।
  • मैके मानते हैं कि मोहनजोदड़ो का शासन एक प्रतिनिधि शासक के हाथ में था।
  • स्टुअर्ट पिग्गट ने पुरोहित वर्ग का शासन माना।


सिन्धी सभ्यता की सामाजिक व्यवस्था .

  • मातृदेवी की पूजा तथा मुहरों पर अंकित चित्रों से यह स्पष्ट होता है कि सिंधु सभ्यता कालीन समाज संभवतः मातृसत्तात्मक था।
  • समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार था।
  • सिंधु सभ्यता का समाज चार वर्गों में विभाजित था- (1) योद्धा (2) पुरोहित (3) व्यापारी (4) श्रमिक |
  • श्रमिकों की स्थिति का आकलन करके व्हीलर ने दास प्रथा का अस्तित्व स्वीकार किया है। सिंध समाज के लोग सूती और ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्रों का प्रयोग करते थे।
  • सिंधु सभ्यता के लोग शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के भोजन ग्रहण करते थे। स्त्रियाँ सौदर्य पर काफी ध्यान देती थीं। काजल, लिपिस्टिक, आइना, कधी आदि के साक्ष्य हडप्पा सभ्यता से मिले हैं।
  • आभषणों का प्रयोग स्त्री एवं पुरुष दोनों करते थे। आभूषणा म चूड़िया, कर्णफूल, हार, अंगठी, मन आदि प्रयोग किए जाते थे।
  • हडप्पा लोगों के मनोरंजन के साधन चौपड़ तथा पासा खलना, शिकार खेलना, मछली पक पशु पक्षियों को लड़ाना इत्यादि थे।
  • धार्मिक उत्सव एवं समारोह समय-समय पर धूमधाम से मनाए जाते थे।
  • अमीर लोग सोने, चाँदी, हाथी दाँत के हार, कंगन, अंगूठी, कान के आभूषण का प्रयोग लोग सीपियों, हड्डियों, ताँब, पत्थर इत्यादि के बने आभूषणों का प्रयोग करते थे।
  • सिधु सभ्यता के लोग मृतकों का दाह संस्कार करते थे। मृतका को जलाने और दफ़नाने के अवशेष मिलते हैं।


सिन्धु सभ्यता की धार्मिक व्यवस्था

  • सैंधव लोगों की धार्मिक मान्यता के बारे में सष्ट जानकारी नहीं मिलती, फिर भी मूर्तिकाओं, मृद्भांडों आदि के आधार पर अनुमान लगाया जाता है।
  • धार्मिक दृष्टिकोण का आधार लौकिक तथा व्यावहारिक था। मूर्तिपूजा का आरंभ संभवत: सैंधव सभ्यता से ही माना जाता है।
  • सिंधु सभ्यता के लोग मातृदेवी, पुरुष देवता (पशुपति नाथ) लिंग-योनि, पशु, जल आदि की पूजा करते थे।
  • पशु पूजा के अंतर्गत कूबड़ वाला साँड़ इस सभ्यता के लोगों के लिए विशेष पूजनीय था। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर पर तीन मुख वाला एक पुरुष ध्यान की मुद्रा में बैठा हुआ है। उसके सिर पर तीन सींग है। उसके बाईं ओर एक गैंडा और भैंसा तथा दाईं ओर एक हाथी, एक व्याघ्र और एक हिरण है। इसे पशुपति शिव की संज्ञा दी गई है।
  • हड़प्पा सभ्यता से स्वास्तिक और चक्र के भी साक्ष्य मिलते हैं। स्वास्तिक और चक्क सूर्य पूजा के प्रतीक थे।
  • कालीबंगा से हवन कुंड प्राप्त हुए हैं जो धार्मिक विश्वास के द्योतक हैं। लोथल, कालीवगा एवं बनवाली से प्राप्त अग्नि वेदिकाओं से पता चलता है कि इस सभ्यता के लोग अग्नि पूजा करते थे।
  • कुछ मद्भाडों पर नाग की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं, जिससे अनुमान लगाया जाता है कि नाग पूजा का भी प्रचलन था।
  • हड़प्पा से प्राप्त एक मृणमूर्तिका के गर्भ से एक पौधा निकलता दिखाया गया है, जो उर्वरता को देवी का प्रतीक है।

सिन्धु सभ्यता की आर्थिक व्यवस्था

  • सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान थी, किंतु पशुपालन और व्यापार भी प्रचलन में थे।
  • इस सभ्यता के लोग गेहूँ, जौ, चावल, कपास व सब्जियों का उत्पादन करते थे।
  • सर्वप्रथम कपास उत्पादन का श्रेय सिंधु सभ्यता के लोगों को ही प्राप्त है। यूनानियों ने इसे 'सिडोन' नाम दिया।
  • हडप्पाई लोग संभवतः लकड़ी के हलों का प्रयोग करते थे। फसल काटने के लिए पत्थर के हसियों को प्रयोग में लाया जाता था।
  • पशुपालन कृषि का सहायक व्यवसाय था। लोग गाय, बैल, भैंस, हाथी, ऊँट, भेड़, बकरी, सूअर और कुत्ते को पालतू बनाते थे।
  • वाणिज्य-व्यापार बैलगाडी और नावों से संपन्न होता था। हड़प्पा, मोहनजोदडो तथा लोथल सैंधव काल के प्रमुख व्यापारिक नगर थे।
  • सैंधववासियों का व्यापारिक संबंध ईरान, अफगानिस्तान, ओमान, सीरिया, बहरीन आदि देशों से भी था। व्यापार मुख्यतः कीमती पत्थरों, धातुओं, सीपियों आदि तक सीमित था।
  • सैंधव सभ्यता के प्रमुख बन्दरगाह- लोथल, रंगपुर, सुत्कागेडोर, सुत्काकोह प्रभासपाटन आदि थे।

 By Mc Graw Hill Education -शीलवंत सिंह | मीनाक्षी कांत

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