लोकसभा | Loksabha - Study Hindi



लोक सभा (Lok Sabha)

लोक सभा भारतीय संसद का लोकप्रिय सदन है इस सदन के सदस्य जनता द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर गुप्त मतदान द्वारा चुने जाते हैं। लोक सभा के सदस्यों की अधिकतम सीमा 550 है जिसमें से 530 राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा 20 संघीय क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति एंग्लो इण्डियन समुदाय के दो सदस्यों को मनोनीत कर सकता है यदि उसके विचार में इस समुदाय के प्रतिनिधियों को लोकसभा में उपयुक्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला। 1976 में लोकसभा के सदस्यों की संख्या 543 (इसके अतिरिक्त दो मनोनीत सदस्य एंग्लो इण्डियन समुदाय से) की गई।

संविधान के अनुच्छेद धाम यह उपबन्ध है कि राष्ट्रपति निलो इंडियान समुदाय के अधिक से अधिक दो सदस्यों को लोकसभा सीट कर सकता है। मूलतः यह उपबन्धक वर्षों के लिए किया गया था, लेकिन संशोधनों के जरिए अभी भी अमल में है।

योग्यताएं (Qualifications)

1.लोक सभा का सदस्य बनने के किसी भी व्यक्ति के पास निम्न योग्यताएं होनी चाहिए
वह भारत का नागरिक हो।
2.उसकी आयु कम से कम 25 वर्ष हो।
3. उसके पास अन्य ऐसी योग्यताएं होनी चाहिए जो संसद द्वारा निर्धारित कोजाएं।
4.बह संघीय तथा राज्य सरकार में किसी लाभदायक पद पर आसीन नहीं होना चाहिए।
5. वह मानसिक रूप से अस्वस्थ तथा घोधित दिवालिया नहीं होना चाहिए। कोई भी व्यक्ति संसद का सदस्य नहीं बन सकता, यदि
6. वह भारत का नागरिक नहीं है और उसने किसी अन्य देश की नागरिकता हासिल कर ली है।
7. वह संसद द्वारा बनाए गये कानून के द्वारा अयोग्य घोषित किया गया है |

दलबदल के नियम के अंतर्गत कोई भी सदस्य संसद की सदस्यता से वंचित किया जा सकता है, यदि
-(i) वह स्वेच्छा से उस दल की सदस्यता त्याग देता है जिसकी टिकट से वह सदन का सदस्य निर्वाचित हुआ था।
(2) वह पार्टी के निर्देशन के विरुद्ध वोट देता है अथवा वोट देने नहीं जाता।

शपथ (Oath)

सदन में अपना स्थान ग्रहण करने से पूर्व प्रत्येक संसद के सदस्य को राष्ट्रपति अथवा उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष एक शपथ लेनी पड़ती है अथवा प्रतिज्ञान करना पड़ता है। जब तक कोई सदस्य शपथ नहीं लेता। वह सदन में नहीं बैठ सकता। यदि वह सदन में शपथ लिए बिना बैठता है तो उसको पांच सौ रुपए प्रतिदिन की दर से जुर्माना देना पड़ता है।

स्थान रिक्त करना (Vacation of Seat)

संसद का कोई भी सदस्य अपने कार्यकाल से पूर्व स्थान रिक्त कर सकता है। इसके लिए उसे सभापति अथवा स्पीकर को सूचित करना पड़ता है। यदि वह सदन की बैठकों से 60 दिन तक बिना सूचित किए अनुपस्थित रहता है तो उसकी सदस्यता को रिक्त घोषित किया जा सकता है।
लोक सभा के सदस्यों को पांच वर्ष के लिए चुना जाता है तथा यह कार्यकाल कम भी हो सकता है यदि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सिफारिश पर उसे भंग कर देता है।

सभापति (Presiding Officer)

लोक सभा के अध्यक्ष को स्पीकर के नाम से जाना जाता है। उसका निर्वाचन लोक सभा के सदस्यों में से ही किया जाता है। इसके अतिरिक्त सदन एक उप सभापति भी चुनता है जो स्पीकर की अनुपस्थिति में कार्य करता है। स्पीकर तथा उपस्पीकर तब तक अपने पद पर बने रहते हैं जब तक वह सदन के सदस्य होते हैं यदि उन्हें सदन की सदस्यता छोड़नी

पड़े तो उन्हें अपना पद भी छोड़ना पड़ता है। परन्तु स्पीकर लोक सभा के भंग होने के पश्चात भी नयी लोक सभा की बैठक तक अपने पद पर बना रहता है। स्पीकर तथा उप स्पीकर अपने पद से कभी भी त्यागपत्र दे सकते हैं, उन्हें लोक सभा द्वारा दो-तिहाई मत से पारित प्रस्ताव द्वारा पद से हटाया जा सकता है।
लोक सभा के अध्यक्ष को महत्त्वपूर्ण शक्तियां दी गई है। वह लोक सभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा उसकी कार्यविधि पर नियंत्रण रखता है वह सदन की मर्यादा तथा विशेषाधिकारों की रक्षा करता है। प्राय: चुनाव के पश्चात् अपनी पार्टी के साथ सभी सम्बन्ध तोड देता है तथा निष्पक्ष रूप से कार्य करता है। संविधान में स्पीकर की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए उसके वेतन को भारत की संचित निधि से देने का प्रावधान करता है तथा इस पर सदन को कोई मत देने का अधिकार नहीं। इसके अतिरिक्त सभापति को उसके पद से तभी हटाया जा सकता है जब सदन के सदस्य बहुमत से उसके विरुद्ध प्रस्ताव पारित कर दें।

महासचिव (Secretary General)

महासचिव की नियुक्ति लोक सभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है। उसका मुख्य कार्य स्पीकर तथा संसद के सदस्यों को संसद से सम्बन्धित मामलों तथा प्रक्रिया के बारे में परामर्श देना है। प्रायः उसी व्यक्ति को महासचिव के पद पर नियुक्त किया जाता है जिसने संसद के सचिवालय में विभिन्न पदों पर कार्य किया हो। महासचिव 60 वर्ष की आय तक अपने पद पर बना रहता है। उसके कार्य की संसद के अन्दर अथवा बाहर आलोचना नहीं की जा सकती। वह अपने कार्यों के लिए केवल लोकसभा अध्यक्ष के प्रति उत्तरदायी है।

विरोधी दल का नेता (Leader of Opposition)

मूल संविधान में विरोधी दल के नेता का कोई प्रावधान नहीं था। यह पद 1977 में संसद द्वारा पारित अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित किया गया, इस अधिनियम द्वारा प्रावधान किया गया कि शासक दल के अतिरिक्त किसी भी दल के नेता को जिसके संसद में सबसे अधिक सदस्य हैं. विरोधी दल के नेता के रूप में मान्यता प्रदान की जाएगी। ऐसा करने के लिए यह आवश्यक है कि उस दल को, लोक सभा के कुल सदस्य संख्या के 10 प्रतिशत स्थान प्रास होने चाहिए। विरोधी दल के नेता को कैबिनेट स्तर के मन्त्री के समान माना जाता है।

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