भारत के राष्ट्रपति की शक्तियां एवं कार्य




राष्ट्रपति (President)

राष्ट्रपति, भारत का संवैधानिक अध्यक्ष है। संविधान संघीय सरकार की समस्त कार्यकारिणी शक्तियां उसे प्रदान करता है। वह इन शक्तियों का प्रयोग या तो स्वयं अथवा अपने अधीन अधिकारियों के माध्यम से करता है।

1. योग्यताएं (Qualifications) -

राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने के लिए किसी भी व्यक्ति के पास निम्न योग्यताएं होनी चाहिए:
(a)वह भारत का नागरिक हो।
(b)वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
(c)  इसके पास लोकसभा का सदस्य बनने की योग्यताएं होनी चाहिए।
(d) वह संघीय सरकार, राज्य सरकार अथवा उसके नियंत्रण में किसी स्थानीय संस्था में लाभ के पद पर आसीन नहीं होना चाहिए। यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि निम्न पद लाभ के पद नहीं माने जाते -राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति, राज्यपाल, केन्द्रीय अथवा राज्य का मंत्री। राष्ट्रपति पद के लिए नाम का प्रस्ताव तथा उसका अनुमोदन कम से कम 50 निर्वाचकों द्वारा किया जाना चाहिए। प्रत्याशी को चुनाव लड़ने के लिए 15000 रुपये जमानत के रूप में जमा कराने पडते हैं।

2. राष्ट्रपति का निर्वाचन (Elections of President)-

राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से एक चुनाव मंडल द्वारा किया जाता है जिसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य तथा सभी राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य सम्मिलित हैं। संविधान के अनुसार जहां तक व्यावहारिक हो केन्द्र तथा राज्यों के प्रतिनिधित्व में एकरूपता होनी चाहिए तथा दोनों को समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए यह प्रयोजन किया गया है कि प्रत्येक राज्य की विधान सभा के सदस्य के मत प्राप्त होने चाहिए जो कि उस राज्य की कुल जनसंख्या को कुल सदस्य संख्या द्वारा विभाजन तथा 1000 से गुणा करने से प्राप्त हों। इसे निम्न रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है
                             राज्य की कुल जनसंख्या                       X1000
                  राज्य विधान सभा के कुल निर्वाचित सदस्य
इस विभाजन के फलस्वरूप यदि शेष 500 अथवा उससे अधिक है तो उसे एक माना जाएगा अतः प्रत्येक सदस्य की मतसंख्या में एक मत की वद्धि हो जाएगी। इसी प्रकार यह निश्चित करने के लिए कि संसद का प्रत्येक सदस्य कितने मत देगा. सभी राज्यों की विधान सभाओं के कुल सदस्यों द्वारा डाले जाने वाले मतों को संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की संख्या से विभाजित किया जाता है। इसे इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है।

                              सभी निर्वाचित विधान सभा  सदस्यों के कुल मत
                                  कुल निर्वाचित संसद सदस्य
यदि इस विभाजन के फलस्वरूप शेष आधे से अधिक आता है तो उसे एक माना जाएगा। चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा गुप्त रूप से होता है। जिस उम्मीदवार को प्रथम वरीयता वाले मतों का स्पष्ट बहुमत प्राप्त होता है उसे निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। परन्तु यदि कोई भी प्रत्याशी प्रथम वरीयता वाले मतों का स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं करता तो सब से कम प्रथम वरीयता वाले मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी के प्रथम वरीयता वाले मत रद्द कर दिए जाते हैं और उन्हें दूसरी वरीयता वाले प्रत्याशियों के नाम कर दिए जाते हैं। इस प्रक्रिया को तब तक दोहराया जाता है जब तक किसी प्रत्याशी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हो जाता।
जुलाई 2007 में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में यूपीए (UPA) तथा वामपंथी गठबंधन की उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल तथा भा.ज.पा. द्वारा समर्पित उम्मीदवार भैरों सिंह शेखावत में सीधा मुकाबला हुआ। इस चुनाव में कुल वैध मत 9,69422 पड़े, जिसमें से प्रतिभा पाटिल को कुल 638 116 मत प्राप्त हुए। उन्होंने 25 जुलाई, 2007 को भारत के 13वें राष्ट्रपति के रूप में पद ग्रहण किया तथा उन्हें भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति बनने का गौरव प्राप्त हुआ।

3. राष्ट्रपति के चुनाव से सम्बन्धित विवाद (Disputes regarding Presidential Election)

राष्ट्रपति के चुनाव से सम्बन्धित सभी झगड़ों की छानबीन तथा निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया जाता है तथा इसका निर्णय अंतिम है। यह ध्यान देने योग्य है कि राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति के चुनाव को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि निर्वाचन मंडल में कोई स्थान किसी भी कारण से रिक्त था।

4.शपथ (Oath)-

अपने पद ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति को भारत के मुख्य न्यायधीश, या उसकी अनुपस्थिति में ज्येष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष शपथ लेनी पड़ती है अथवा प्रतिज्ञान करना पड़ता है कि वह पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करेगा तथा भारत की जनता की सेवा तथा कल्याण में निरत रहेगा।

5. राष्ट्रपति का कार्यकाल (Tenure of President)-

राष्ट्रपति का कार्यकाल पांच वर्ष है जो कि उस द्वारा पद सम्भालने की तिथि से प्रारम्भ होता है। राष्ट्रपति दूसरे कार्य-काल के लिए भी चुना जा सकता है। अभी तक केवल एक ही राष्ट्रपति (डॉ. राजेन्द्र प्रसाद) कोदो बार राष्ट्रपति पद के लिए चुना गया।राष्ट्रपति अपना कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व भी पद त्याग सकता है। इसके लिए उसे अपना त्याग पत्र उप-राष्ट्रपति को देना पड़ता है।

6. राष्ट्रपति के वेतन तथा भत्ते (Salary and Allowances)-

दिनांक 1 जनवरी, 2006 से राष्ट्रपति 1,50,000 रुपये प्रतिमाह वेतन पाने का हकदार है। पद छोड़ देने के बाद राष्ट्रपति अपनी हर महीने उपलब्धियों की 50 प्रतिशत की दर से पेंशन पाने का हकदार है। इसके अतिरिक्त उसे अनेक अन्य भत्ते व सुविधाएं प्रदान की जाती हैं, जैसे-नि:शुल्क सरकारी निवास बिजली और पानी सहित, टेलीफोन, कार, सचिवालय सम्बन्धी सहायता।

7. महाभियोग (Impeachment)-

राष्ट्रपति को उसका कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व महाभियोग द्वारा उसके पद से हटाया जा सकता है। महाभियोग का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में से किसी भी सदन में इस आधार पर प्रस्तुत किया जा सकता है कि उसने संविधान का उल्लंघन किया है। एक सदन द्वारा महाभियोग के आरोप लगाए जाने के पश्चात् दूसरा सदन उन आरोपों की छानबोन करता है तथा राष्ट्रपति को स्वयं या अपने प्रतिनिधि के द्वारा अपना पक्ष रखने का अधिकार होगा। यदि दूसरा सदन आवश्यक छान-बीन के पश्चात दो-तिहाई बहुमत से यह प्रस्ताव पारित कर देता है कि आरोप सही हैं तो राष्ट्रपति को ऐसा प्रस्ताव पारित किए जाने की तिथि से पद से हटना होगा।

8. पद की रिक्ति (Vacancy)-

यदि राष्ट्रपति का पद मृत्यु, त्यागपत्र, अथवा पद से हटाए जाने के कारण खाली होता है तो उप-राष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है। और यदि उप-राष्ट्रपति भी राष्ट्रपति के पद के कर्तव्यों को नहीं निभा पाता तो भारत का मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है। मुख्य न्यायाधीश एम० हिदायतुल्ला 20 जुलाई 1969 से 24 अगस्त 1969 तक राष्ट्रपति के पद पर कार्य करते रहे क्योंकि उस समय के कार्यवाहक राष्ट्रपति वी० वी० गिरि ने राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने के लिए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। मुख्य न्यायाधीश की अनुपस्थिति में ज्येष्ठतम न्यायाधीश राष्ट्रपति के पद पर कार्य करता है। यह व्यक्ति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है और उसे राष्ट्रपति पद से सम्बन्धित सभी शक्तियां तथा सुविधाएं प्राप्त होती हैं। राष्ट्रपति पद के लिए नया चुनाव पद रिक्त होने के 6 मास के भीतर हो जाना चाहिए।

राष्ट्रपति की शक्तियां (Powers of the President)

 राष्ट्रपति की शक्तियों का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता हैं।

1.कार्यपालक शक्तियां (Executive Powers)-

राष्ट्रपति देश का कायकारिणी अध्यक्ष अनुच्छेद-5)तथा संघीय सरकार के सभी कार्यकारिणी निर्णय उसके नाम में लिए जाते हैं। संघ सरकार के सभी प्रमुख अधिकारी राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं (अनुच्छेद-77)। कुछ प्रमुख अधिकारी जिन्हें राष्ट्रपति नियुक्त करता है उसमें प्रधानमंत्री, मंत्री परिषद् के सदस्य, भारत का मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालायों के न्यायाधीश, संघ लोक सेवा आयोग का सभापति तथा अन्य सदस्य, भारत का नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India), भारत का महान्यायवादी (Attorney General of India), राज्यपाल, वित्त आयोग के सदस्य इत्यादि सम्मिलित हैं।

राष्ट्रपति की विधायी शक्तियाँ

राष्ट्रपति को  निम्नलिखित विधायी शक्तियाँ प्रदान की
1. संसद से सम्बन्धित शक्तियाँ राष्ट्रपति,
संसद के सदनों के अधिवेशन को बुलाता है, सत्रावसान करता है तथा लोकसभा को भंग कर सकता है। गतिरोध उत्पन्न होने की स्थिति में संसद के दोनों सदनों की संयुक्त
बैठक आहूत करता है।
2. विधेयक पेश करने के लिए राष्ट्रपति कीपूर्व मंजूरी या सिफारिश
राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी या सिफारिश के बिना संसद में निम्नलिखित विधेयक पेश नहीं किये जा सकते (a) नए राज्यों के निर्माण या वर्तमान राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन सम्बन्धी विधेयक, (b) धन विधेयक, (c) कोई विधेयक, जो सही अर्थों में धन विधेयक नहीं है, किन्तु जिससे भारत की संचित निधि से व्यय करना पड़ेगा, (d) जिस कराधान से राज्य का हित हो, उस कराधान पर प्रभाव डालने वाले विधेयक, (e) व्यापार की स्वतन्त्रता पर निबंधन अधिरोपित करने वाले राज्य विधेयक।
3. राज्य विधानमण्डल द्वारा बनायी जाने वाली विधि के सम्बन्ध में राष्ट्रपति की शक्ति राज्य विधानमण्डल द्वारा बनायी जाने वाली विधि के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को निम्नलिखित शक्तियाँ प्राप्त हैं (a) यदि राज्य विधानमण्डल कोई ऐसा विधेयक पारित करता है, जिससे उच्च न्यायालय की

अधिकारिता प्रभावित होती है, तो राज्यपाल उस विधेयक पर अनुमति नहीं देगा और उसे राष्ट्रपति की अनुमति के लिए आरक्षित कर देगा। (b) राज्य विधानमण्डल द्वारा सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए पारित विधेयक को राष्ट्रपति की अनुमति के लिए आरक्षित रखा जाएगा। (c) किसी राज्य के अन्दर दूसरे राज्यों के साथ व्यापार आदि पर प्रतिबन्ध लगाने वाले विधेयकों को विधानसभा में पेश करने के पहले राष्ट्रपति की अनुमति लेनी होगी। (d) वित्तीय आपात स्थिति के प्रवर्तन की स्थिति में राष्ट्रपति निर्देश दे सकता है कि सभी धन विधेयकों को राज्य विधानसभा में पेश करने से पहले उन पर राष्ट्रपति का अनुमोदन लिया जाये।
4. अध्यादेश जारी करने की शक्ति
जब संसद का सत्र न चल रहा हो, तब राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है। इस प्रकार का जारी किया गया अध्यादेश उतना ही प्रभावपूर्ण एवं शक्तिशाली होगा, जितना कि संसद द्वारा पारित किया गया कानून, परन्तु ये अध्यादेश संसद के अगले सत्र प्रारम्भ होने के छ: सप्ताह के पश्चात् समाप्त समझे जायेंगे।
5. विशेषाधिकार या वीटो की शक्ति संसद
द्वारा पारित कोई भी विधेयक अधिनियम तब तक नहीं बन सकता है जब तक कि उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति नहीं मिल जाती। जब दोनों सदनों से पारित किये जाने के पश्चात् कोई विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति निम्नलिखित तीन कार्यों में से कोई एक कर सकता है (a) वह यह घोषित कर सकता है वह विधेयक को अनुमति देता है, (b) वह यह घोषित कर सकता है कि वह विधेयक को अनुमति देने से इंकार कर सकता है, (c) यदि वह धन विधेयक नहीं है तो पुनर्विचार के लिए पुनः संसद में भेज सकता है। धन विधेयक को पुनर्विचार हेतु नहीं लौटाया जा सकता है। हालांकि, संविधान द्वारा राष्ट्रपति को स्पष्टत: वीटो की शक्ति प्रदान नहीं की गयी है, लेकिन संविधान के अनुसार किये गये कार्यों तथा स्थापित परम्पराओं के अनुसार यह माना जाता है कि राष्ट्रपति को तीन प्रकार के वीटो शक्तियाँ प्राप्त हैं-1. पूर्ण वीटो, 2. निलम्बनकारी वीटो और 3. जेबीवीटो.

* पूर्ण वीटो
जब राष्ट्रपति किसी विधेयक के अनुमति नहीं देता है तो यह कहा जाता है। राष्ट्रपति ने पूर्ण वीटो की शक्ति का प्रयोग किया है। राष्ट्रपति इस वीटो की शक्ति का प्रयोग गैर सरकारी विधेयक पर अनुमति न प्रदान करके कर सकता है या ऐसे विधेयक पर अनुमति न प्रदान करके कर सकता है जो किसी सरकार के द्वारा पारित किया गया हो, जो विधेयक पर अनुमति देने के पूर्व ही त्यागपत्र दे दे और नया सरकार विधेयक पर अनुमति न देने के सिफारिश करे।
निलम्बनकारी वीटो
जब राष्ट्रपति किस विधयक के प्रभाव को निलम्बित रखने के लि अनुमति देने हेतु अपने पास प्रेषित विधेयक संसद के पास पुनर्विचार के लिए भेजता
लिए भेजता है, तो यह कहा जाता है कि उन्होंने निलम्बनकारी वीटो का प्रयोग किया है।
जेबी वीटो
इसे पॉकेट वीटो भी कहा जाता है। जब राष्ट्रपति संसद द्वारा पारित करके अनुमति के लिए भेजे गए विधेयक पर न तो अनुमति देता है और न ही उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेजता है तो यह कहा जाता है कि राष्ट्रपति ने जेबी या पॉकेट वीटो का प्रयोग किया है। इस वीटो का प्रयोग राष्ट्रपति (ज्ञानी जैल सिंह) ने 1986 में संसद द्वारा पारित भारतीय डाक (संशोधन) अधिनियम के सन्दर्भ में किया है। राष्ट्रपति ने न तो इस पर अपनी अनुमति दी है। और न ही इसे संसद के पास पुनर्विचार के लिए भेजा है।

3. वित्तीय शक्तियां (Financial Powers)-
संसद में सभी वित्तीय विधेयक केवल राष्ट्रपति की सिफारिश पर प्रस्तुत किए जाते हैं। भारत की आकस्मिक निधि (Contingency Fund of India) का नियंत्रण राष्ट्रपति के पास है। वह इस निधि से आकस्मिक कार्य के लिए धन जुटा सकता है परन्तु इसे संसद की स्वीकृति के पश्चात निधि में डालना पड़ता है। राष्ट्रपति हर पांच वर्ष पश्चात वित्त आयोग गठित करता है (अनुच्छेद-280)जो केन्द्र व राज्यों में करों के बटवारे से सम्बन्धित सिफारिशें करता है।
4.न्यायिक शक्तियां (Judicial Powers)-
राष्ट्रपति को महत्त्वपूर्ण न्याविक शक्तियां प्राप्त हैं। वह सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालायों के मुख्य न्यायाधीशों व अन्य न्यायाधीशों को नियुक्त करता है। राष्ट्रपति किसी भी व्यक्ति को, जिसे संघीय कानून के अंतर्गत दण्ड दिया गया है क्षमा प्रदान कर सकता है। राष्ट्रपति को दण्ड कम करने अथवा स्थगित करने का भी अधिकार है। राष्ट्रपति पद पर रहते हुए किए गए सरकारी कार्य के लिए किसी भी न्यायालय के सम्मुख उत्तरदायी नहीं (अनुच्छेद-72)

5. आपातकालीन शक्तियां (Emergency Powers)
आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए संविधान राष्ट्रपति को असाधारण (extraordinary) शक्तियां प्रदान करता है। संविधान में तीन प्रकार की आपातकालीन परिस्थितियों की परिकल्पना की गई है-(6) बाह्य आक्रमण अथवा आन्तरिक विद्रोह के कारण उत्पन्न होने वाला संकट (अनुच्छेद 352)1 (1) राज्य में संवैधानिक मशीनरी के विफल होने से उत्पन्न होने वाला संकट (अनुच्छेद356) । (iii) देश की वित्तीय स्थिरता अथवा साख को खतरे से उत्पन्न होने वाला संकट (अनुच्छेद-360) । इन आपातकालीन परिस्थितियों में राष्ट्रपति को इतनी अधिक शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं कि आलोचक उन्हें भारत के लोकतंत्र के लिए एक खतरा मानते हैं।
6. सैन्य शक्तियां (Military Powers)-
देश की रक्षा सेनाओं का सर्वोच्च कमांडर होने के नाते राष्ट्रपति सेना, नौसेना, तथा वायु सेना के अध्यक्षों की नियुक्ति करता है। उसे युद्ध की घोषणा करने तथा शांति स्थापित करने का भी अधिकार है।
7. राजनयिक शक्तियां (Diplomatic Powers)-
राष्ट्रपति अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व करता है। वह दूसरे देशों में भारत के राजदूत भेजता है तथा उन देशों के राजदूतों को स्वीकार करता है। सभी अंतर्राष्ट्रीय संधियां तथा समझौते राष्ट्रपति की ओर से किए जाते हैं। इन संधियों तथा समझौतों को संसद द्वारा अनुमोदित किया जाना आवश्यक है।
राष्ट्रपति की स्थिति (Position of the President)
भारत की संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति एक संवैधानिक अध्यक्ष की भूमिका निभाता है। संविधान प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक मंत्री परिषद् का गठन करता है जो राष्ट्रपति को उसके कार्यों में सहायता व परामर्श देती है। मूल संविधान इस विषय पर मूक था कि क्या राष्ट्रपति मंत्री परिषद् के परामर्श को मानने के लिए बाध्य है अथवा नहीं। परन्तु इंग्लैण्ड की संसदीय शासन व्यवस्था की परम्पराओं के अनरूप राष्ट्रपति प्राय: मंत्री परिषद् की सलाह पर ही कार्य करता था। इस अस्पष्टता को 42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा दूर कर दिया गया तथा यह स्पष्ट कर दिया गया कि राष्ट्रपति मंत्री परिषद् की सलाह द्वारा बाध्य होगा। इस संशोधन के फलस्वरूप राष्ट्रपति को एक सलाहकार तथा मार्गदर्शक की भूमिका से वंचित कर दिया गया। 1978 में 44वें संवैधानिक संशोधन द्वारा राष्ट्रपति की स्थिति में कुछ सुधार करने का प्रयास किया गया तथा यह प्रयोजन किया गया कि राष्ट्रपति मंत्री परिषद् को अपने परामर्श पर पुनः विचार करने के लिए कह सकता है। पुन: विचार के पश्चात् दिए गए परामर्श को स्वीकार करना राष्ट्रपति के लिए अनिवार्य है। इस प्रकार संशोधन ने राष्ट्रपति की सीमित व अनिवार्य भूमिका को स्वीकार किया। अब भी राष्ट्रपति नीति को पर्याप्त मात्रा में प्रभावित कर सकता है। राष्ट्रपति को परामर्श देने का अधिकार है। वह सरकार को प्रोत्साहित कर सकता है तथा उसे चेतावनी भी दे सकता है। इसके अतिरिक्त अनेक मामलों में राष्ट्रपति स्वविवेक का प्रयोग कर सकता है जैसे कि
(1) यदि संसद में किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो अथवा बहुमत दल का कोई सर्वमानीय नेता न हो, तो वह स्वेच्छा से प्रधानमन्त्री की नियुक्ति कर सकता है।
(2) यदि मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास पारित हो जाने व त्यागपत्र दिए जाने के पश्चात, यह सिफारिश की जाती है कि सदन को भंग कर दिया जाए तथा नये चुनाव कराए जायें तो इसको मानना अथवा न मानना राष्ट्रपति की इच्छा पर निर्भर करता है।
(3) संसद द्वारा पारित विधेयक पर 'पॉकिट वीटो' का प्रयोग
(4) लोक सभा के सदस्यों को आयोग्य घोषित करना
(5) मन्त्री परिषद् को अपने निर्णय पर पुनः विचार करने के लिए कहना तथा
(6) संसद को किसी विधेयक पर पुनः विचार के लिए कहना।।



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