प्रधानमंत्री तथा मंत्री परिषद् - Study Hindi



प्रधानमंत्री तथा मंत्री पारषद् (The Prime Minister and Council of Ministers)

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प्रधानमंत्री तथा मंत्री परिषद्

वास्तविक कार्यपालिका (Real Executive Authority)

राष्ट्रपति कार्यकारिणी का नाम मात्र अध्यक्ष है तथा वास्तविक कार्यकारिणी शक्तियों का प्रयोग प्रधानमंत्री व उसकी मंत्री परिषद् द्वारा किया जाता है।

प्रधानमंत्री (The Prime Minister)

भारत के प्रधानमंत्री का पद संविधान द्वारा स्थापित किया गया है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। प्राय: राष्ट्रपति लोक सभा के बहुमत दल के नेता को प्रधानमंत्री पद के लिए आमंत्रित करता है। सैद्धान्तिक रूप से भले ही प्रधानमंत्री राष्ट्रपति की इच्छा अनुरूप पद पर बना रहता है परन्तु वास्तव में वह तब तक अपने पद पर बना रहता है जब तक उसे संसद का समर्थन प्राप्त हो। प्रधानमंत्री का कार्यकाल 5 वर्ष है परन्तु यदि सदन उससे पूर्व भंग कर दिया जाए तो प्रधानमंत्री का कार्यकाल स्वयं कम हो जाता है।
प्रधानमंत्री को वही वेतन तथा भत्ते दिए जाते हैं, जो संसद के सदस्यों को प्रदान किए जाते हैं। उसे अन्य सदस्यों की भांति प्रतिमास चुनाव क्षेत्र भत्ता भी दिया जाता है। इसके अतिरिक्त उसे 3000 रु प्रति मास सत्कार भत्ता, निशुल्क सरकारी निवास, मुफ्त यात्रा करने की सुविधा, चिकित्सा सुविधाएं इत्यादि प्रदान किए जाते

प्रधानमंत्री की शक्तियां (Powers of Prime Minister)-

प्रधानमंत्री को व्यापक शक्तियां प्रदान की गई हैं। उसकी कुछ प्रमुख शक्तियां इस प्रकार हैं:
1. वह लोक सभा में बहुमत दल का नेता होता है तथा राष्ट्रपति लोक सभा के सभी सत्र उसके परामर्श से ही बुलाता तथा स्थगित करता है।

2. वह राष्ट्रपति को लोक सभा का कार्यकाल पूरा होने से पूर्व भंग करने की सिफारिश कर सकता है।
3. मंत्री परिषद् के सभी सदस्यों को राष्ट्रपति उसी की सिफारिश पर नियुक्त करता है।
4. वह मंत्रियों के विभागों का बंटवारा करता है तथा उनमें परिवर्तन भी कर सकता है। वह किसी भी मंत्री को त्यागपत्र देने के लिए कह सकता है अथवा उसे राष्ट्रपति द्वारा पद से निष्कासित करा सकता है।
5. वह मंत्रीमंडल की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा इसके निर्णयों को बहुत हद तक प्रभावित करता है।
6. वह अन्य मंत्रियों के काम पर नियंत्रण रखता है तथा सुनिश्चित करता है कि वह एक टीम की भांति कार्य करें।
7. यदि प्रधानमंत्री त्यागपत्र दे दे तो मंत्रीपरिषद् अपने आप भंग हो जाती है। वास्तव में वह एक ऐसी धुरी है जिसके चारों और मंत्री परिषद् घूमती है।
8. प्रधानमंत्री राष्ट्रपति तथा मंत्री परिषद् के बीच आदान-प्रदान की मुख्य कड़ी है। उसका यह कर्त्तव्य है कि राष्ट्रपति को मंत्री परिषद् के सभी निर्णयों से अवगत कराए।
9. वह राष्ट्रपति को सभी प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति करने में सहायता देता है।
10. वह मंत्रियों की अनुमति से राष्ट्रपति को युद्ध, बाह्य आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह के कारण देश में संकट घोषित करने का परामर्श दे सकता है।

11. वह राष्ट्रपति को किसी भी राज्य में संवैधानिक मशीनरी के विफल आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू करने का परामर्श दे सकता है। इसी प्रकार वे देश के आर्थिक संतुलन बिगड़ने के आधार पर वित्तीय संकट घोषित करने की सिफारिश कर सकता है।
प्रधानमंत्री का पद बहुत ही महत्वपूर्ण व सम्मानीय पद है। परन्तु उसकी वास्तविक स्थिति उसके व्यक्तित्व तथा संसद में उसके राजनीतिक दल की स्थिति पर निर्भर करती है।

उप-प्रधानमंत्री (Deputy Prime Minister)

भारत के उप-प्रधानमंत्री पद के बारे में संविधान पूर्णतया मूक हैं भले ही संविधान लागू होने से आज तक सात व्यक्ति इस पद पर आसीन हो चुके हैं। प्रथम उपप्रधानमंत्री होन का रसदाभाई पटेल को जाता है जो कि मंडल जवाहरलाल नेहरू कमात्रमंडल में गृहमंत्री थे। इसके उप-प्रधानमंत्री मोरारजी दमाई या जिन्हें कांग्रेस मिटिकटके कहने पर इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में सम्मिलित किया गया। जनता पार्टी में संकट को निपटाने के लिए मोरारजी देसाई के मंत्रिमंडल मचरणसिंह तथा जगजीवन राम को उप-प्रधानमंत्री का पद प्रदान किया गया। वाई-बीचव्हाण ने भी चरण सिंह मंत्रिमंडल में कुछ समय के लिए उपप्रधानमंत्री पद सम्भाला। वीपी सिंह की जनता दल सरकार में 1989 में देवी लाल उप-प्रधानमंत्री नियुक्त किए गर। जून 2002 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लालकृष्ण आडवाणी को उप-प्रधानमंत्री नियुक्त किया। इस पद के साथ-साथ बह ग्रहमंत्री के रूप में भी कार्य करते रहे।
उप-प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री के बाद स्थान प्राप्त है। वह प्रधानमंत्री को सहायता प्रदान करता है तथा उसकी अनुपस्थिति में उसके पद से सम्बन्धित सभी उत्तरदायित्व निभाता है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि भारत के प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-1970) ने सरकार की मशीनरी तथा इसकी काय प्रक्रिया से सम्बन्धित रिपोर्ट में उप-प्रधानमंत्री पद की स्थापना की सिफारिश की थी ताकि सरकारी तंत्र प्रभावशाली पर कार्य कर सके। रिपोर्ट ने सुाया कि प्रधानमंत्री अपने कार्य भार को कम करने के लिए उप-प्रधानमंत्री को कुछ कार्य माप सकता है अथवा कुछ जिम्मेदारियां अस्थाई रूप से उसे प्रदान कर सकता

मंत्री परिषद् (Council of Ministers)

भारत का संविधान प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्री परिषद् के गठन का प्रयोजन करता है। मूल संविधान के अंतर्गत मंत्री परिषद् का मुख्य कार्य राष्ट्रपति को उसके कार्य में सहायता तथा परामर्श देना है। मूल संविधान में इस बात का कोई संकेत नहीं था कि वह मंत्री परिषद् के परामर्श को मानने के लिए बाध्य था। 1976 में संविधान में एक संशोधन द्वारा यह प्रयोजन किया गया कि राष्ट्रपति मंत्री परिषद् के परामर्श अनुसार कार्य करेगा।

मंत्री परिषद् में तीन प्रकार के मंत्री होते हैं-केबीनेट स्तर के मंत्री, राज्य मंत्री तथा उप मंत्री। कैबिनेट स्तर के मंत्री प्राय: स्वतंत्र रूप से किसी मंत्रालय अथवा विभाग का भार सम्भालते तथा वह अन्य दो श्रेणियों के मंत्रियों से उच्च माने जाते हैं। राज्य मंत्री या तो किसी विभाग को स्वतंत्र रूप से कार्यभार सम्भालते हैं अथवा किसी कबीनेट स्तर के मंत्री के अधीन कार्य करते हैं। उप-मंत्री प्राय: किसी विभाग का स्वतंत्र कार्यभार नहीं सम्भालते तथा किसी केबीनेट स्तर के मंत्री के साथ सम्बन्धित रहते हैं।

मन्त्री परिषद तथा मंत्रिमंडल में भिन्नता मंत्री परिषद तथा मंत्रिमंडल शब्दों का प्रयोग प्रायः एक-दूसरे के लिए किया जाता है। परन्तु वास्तव में यह एक-दूसरे से निम्न मायनों में भिन्न हैं:

1. मंत्रिमंडल की तुलना में मंत्रिपरिषद एक बड़ी संस्था है और इसके प्राय: 60 से 70 सदस्य होते हैं। दूसरी ओर मंत्रिमंडल के केवल 15 से 20 सदस्य होते हैं। 91वें संशोधन अधिनियम, 2003 के अनुसार भत्ता परिषद् की सीमा की संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।
2. नीति सम्बन्धी सभी निर्णय मंत्रिमंडल द्वारा लिए जाते हैं तथा मंत्रिपरिषद केवल उन निर्णयों को कार्यान्वित करती है।
3. मंत्रिपरिषद में तीन प्रकार के मंत्री होते हैं। यानि कैबिनेट स्तर के मन्त्री, राज्य मंत्री तथा उप मंत्री। मंत्रिमंडल में केवल कैबिनेट स्तर के मंत्री सम्मिलत होते हैं।
4. संविधान समस्त शक्तियां मंत्रिपरिषद को प्रदान करता है परन्तु वास्तव में इन शक्तियों का प्रयोग मंत्रिमंडल द्वारा किया जाता है।
5. विभिन्न मंत्रियों द्वारा किए जाने वाले कार्यों को मंत्रिमंडल निर्धारित करता है।
6. मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति उत्तरदायी है और इस उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करने का दायित्व मंत्रिमंडल पर है।
7. मंत्री परिषद एक संस्था के रूप में अपने उत्तरदायित्व को निभाने के लिए कभी कभार ही मिलती है। इसके विपरीत मंत्रिमंडल सरकारी काम को निभाने के लिए साप्ताहिक बैठकें करता है।
8. समूचे संविधान में मंत्रिपरिषद शब्द का प्रयोग किया गया है। केवल अनुच्छेद 352 में मंत्रिमंडल शब्द का प्रयोग किया गया है। यह शब्द 44वें संशोधन द्वारा संविधान में जोड़ा गया। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि राष्ट्रपति राष्ट्रीय संकट की घोषणा केवल मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश पर कर सकता है।


सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Responsibility)-

मंत्री परिषद् सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है (अनुच्छेद 75)। जैसे ही यह लोक सभा का विश्वास खोती है उसे अपना त्यागपत्र देना पड़ता है। मंत्री परिषद् के किसी एक मंत्री के प्रति अविश्वास प्रस्ताव पास कर दिया जाता है तो यह समस्त मंत्री परिषद के प्रति अविश्वास माना जाता है और इसके लिए समस्त मंत्री परिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है। सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धान्त का यह भी अर्थ है कि मंत्रिगण अपने मतभेदों को खुलेआम प्रकट नहीं कर सकते। यदि मंत्री परिषद् का कोई सदस्य इस के निर्णय से सहमत न हो तो उसे अपना त्यागपत्र दे देना चाहिए। सामूहिक उत्तरदायित्व होने के साथ-साथ प्रत्येक मंत्री अपने विभाग का व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी है तथा उसे राष्ट्रपति (प्रधानमंत्री) के परामर्श पर उसके पद से हटा सकता है भले ही उसे लोक सभा का समर्थन प्राप्त हो।

मंत्री परिषद् की शक्तियां

मंत्री परिषद् को निम्न शक्तियां प्राप्त हैं: ___1. यह देश की नीति निर्धारित करती है जिसके आधार पर प्रशासन चलाया जाता है।
2. यह सभी महत्त्वपूर्ण विधायकों तथा प्रस्तावों को संसद में प्रस्तुत करती है तथा उन्हें पारित कराती है।
3. यह संसद के सम्मुख देश का बजट प्रस्तुत करती है। भले ही संसद को बजट में परिवर्तन करने का अधिकार है परन्तु प्राय: यह उसे उसी रूप में पारित कर देती है जिस रूप में वह प्रस्तुत किया जाता है।
4. यह देश की विदेश नीति निर्धारित करती है और यह निश्चित करती है कि अन्य शक्तियों के साथ किस प्रकार से सम्बन्ध स्थापित किए जाएं। राष्ट्रपति
सभी राजदूतों की नियुक्ति मंत्री परिषद् की सिफारिश पर करता है। सभी अंतर्राष्ट्रीय 5 समझौतों तथा संधियों का अनुमोदन मंत्री परिषद् द्वारा किया जाता है।
5. मंत्री परिषद् के कैबिनेट स्तर के मंत्री राष्ट्रपति को युद्ध, विदेशी आक्रमण तथा सशस्त्र विद्रोह के आधार पर आपातकालीन परिस्थिति की घोषणा करने का परामर्श देते हैं।



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